सावरकर समय -काल से पहले वर्णाश्रम-व्यवस्था के खिलाफ खुले तौर पर मुखर थे। इतना काफी है सावरकर का सम्मान करने के लिए, कम से कम ओछी टिपण्णी तो नहीं की जा सकती है। इसके बाद उनके शेष राजनीतिक जीवन की समीक्षा-आलोचना की जा सकती है ।
सावरकर ब्रिटिश हुकुतम को उखाङ फेंकना चाहते थे और जिसके कारण उनको काला-पानी की कठोर सजा हुई और इस सजा से बच कर निकलने के लिए ब्रिटिश हकुमत से माफी माँगी और फिर सिस्टम-तंत्र में शामिल हो गए ! ब्रिटिश हुकुमत के प्रति वफादार रहने वादा करना एक डिप्लोमेटिक लग्वैंज है ।
काँग्रेस अपने जन्म से ही सिस्टम-तंत्र, ब्रिटिश हकूमत का अंग था और नेहरू, गाँधी ये सब सिस्टम-तंत्र का अंग थे और जीवन भर रहें ! सिस्टम-तंत्र से बाहर रह कर विरोध करने वाले भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस जैसे लोग थे। भील आंदोलन, बिरसा मुंडा, आदिवासी विद्रोह भी इसी प्रकृति था।
इंदिरा गाँधी ने सावरकर के नाम से डाक टिकट तक जारी किया है, सावरकर को बहादुर-देशभक्त बताया है तो आज वाड्रा-गाँधी प्राईवेट लिमिटेड राजनीतिक कंपनी के लिए कार्य करने वाले लिबरल, सेकुलर, बीरबल बुद्धिजीवी पत्रकार सावरकर को लेकर ओछी टिपण्णी करते हुए ट्रोल क्यों कर रहे हैं ?
सुभाष चंद्र बोस को जीवित या मृत्यु उपरांत ब्रिटिश सरकार को प्रत्यर्पित करने का एग्रीमेंट किसने किया था ?
ये देश यदि भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हुआ होता तो इस देश का चरित्र कुछ और होता और भगत सिंह होते तो देश का बँटवारा भी नहीं होता !
काँग्रेस, नेहरू-गाँधी की परंपरा रही है, समय-समय पर कभी हिन्दु-ब्राह्मण संप्रदायिकता और मुस्लिम संप्रदायकिता को बारी बारी सहलाना और उसी का नतीजा है कभी कुर्ते के ऊपर जनेऊ दिखने लगता है और कभी कोई हनुमान चलीसा पढ़ने लगता है !
-राकेश कुमार दांगी, प्रसिद्ध सामाजिक चिंतक & राजनैतिक विश्लेषक
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