केंद्र सरकार ने किसानों के हित विरुद्ध पारित तीन कृषि क़ानूनों को वापस ले लिया है। अभी यह लड़ाई आधी ही जीती जा सकी है पूरी जीत तब होगी, जब MSP पर केंद्र सरकार स्पष्ट क़ानून लाए, जिसमें कृषि उपज के मूल्य का निर्धारण में खेत के भूमि मूल्य के 10 प्रतिशत प्रति वर्ष रेंट एवं किसान का लागत मूल्य और किसान का श्रम जोड़कर फिर लागत का डेढ़ गुना मूल्य निर्धारण हो।
यानी किसी किसान के पास अगर एक एकड़ कृषि भूमि है और एक एकड़ कृषि भूमि का मूल्य 10, लाख रुपये हुए, तो दस लाख का 10 प्रतिशत यानी एक लाख प्रति वर्ष भूमि का किराया हुआ। यह भूमिका किराया किसानों के कृषि उपज के लागत मूल्य में जुड़ना चाहिए। इसी प्रकार यदि किसान के ट्रैक्टर ट्रॉली या खेत पर कोई निर्माण कर रखा है तो उसके भी लागत मूल्य का 10 प्रतिशत फ़सल लागत में जोड़ा जाना चाहिए। अभी मात्र खाद बीज पानी दवा आदि का लागत मूल्य और किसान का श्रम ही जोड़कर डेढ़ गुना लागत मूल्य निर्धारित किया जा रहा है, जबकि औद्योगिक लागत मूल्य निर्धारण में स्थायी परिसम्पतियों का प्रतिवर्ष का रेंट लागत मूल्य में जोड़ा जाता है।
अभी कृषि लागत मूल्य में कृषि भूमि का वार्षिक किराया नहीं जोड़ा जा रहा है,जबकि औद्योगिक उत्पादन में कुल परिसंपत्ति मूल्य का 10 प्रतिशत पूंजी लागत में जोड़ा जाता है.
--तपेंद्र प्रसाद शाक्य, पूर्व आईएएस एवं पूर्व अध्यक्ष, सम्यक पार्टी, भारत
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