भगवान् बुद्ध का विपस्सना ध्यान क्या है, भारत में किसने इसको पुनर्जीवित किया?

10 वीं शताब्दी के बाद भगवान् तथागत गोतम बुद्ध द्वारा ज्ञापित 'विपस्सना-भावना' से भावित भिक्खुओं का पूरे-विश्व में विलोप हो गया था, भावित भिक्खुओं की संख्या नगण्य सी बची थी, तब विपस्सना केवल तिपिटकिय व तिपिटकेत्तर ग्रंथो में ही शेष रह गई, मानव समाज में लुप्त हो गई थी ।

भिक्खु भी इस आसय के साथ जीवन व्यतीत करने लगे कि अब तो अनागत मैत्रेय-बुद्ध ही इस विपस्सना विधि को पुन: स्थापित करेंगे और तब तक दस-कुसल-कम्म व सीलों के आश्रय से ही इंतजार करना चाहिए ।
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लेकिन वर्ष 1754 में बर्मा में भिक्खु Medawi (1728-1816) ने इस विचार पर प्रहार करते हुऐ महासतिपट्ठान-सुत्त व विशुद्धिमग्ग को आधार बनाकर -
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'विपस्सना - हस्तपुस्तिका' लिखकर इस विद्या को पुन: सार्वजनिक कर दिया व उस समय के भिक्खु-संघ में विपस्सना-भावना पुन:जीवित करने के उत्साह का संवर्धन ताउम्र करते रहे ।
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भदंत लैडी सयाडो (1846-1923) ने विपस्सना को भिक्खु-संघ के साथ उपासक/उपासिका में भी संवर्धन के सफल प्रयास किये व विद्या को जाग्रत करने के लिए उपासकों के लिए भी द्वार खोलने का करुणामय निर्णय लिया गया और ऐसे उपासकों को तैयार किया जो न केवल उपासक/उपासिका को बल्कि भिक्खु-संघ को भी विपस्सना सिखाने लगे,
ऐसे ही एक उपासक का नाम 'सया तैजी' (1873-1945) था,
उपासक 'सया तैजी' ने बहुत से उपासको को विपस्सनाचार्य व सहायक विपस्सनाचार्य के रूप में तैयार किया ,
उन्ही तैयार किये गये विपस्सनाचार्यों में से एक एस0एन0गोयन्का जी (1924-2013) के गुरू उपासक उ-बा-खिन जी (1899-1971) थे, और आज हम पूरे विश्व में 'विपस्सना-भावना' को फलते फूलते हुये देख रहे हैं ।
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ऐसे ही उपाय उपासक/उपासिका को कहे सुत्तों को आधार बनाते हुऐ, उपासक/उपासिका के लिए -
भोगों कि विपुलता,
भोगों के वितरण,
अनाकुला च कम्मन्ता, आदि संदेशों को प्रज्ञापित करने वाले सुत्तों को संकलित कर एक प्राचीन परंपरा को पुन: जीवित कर सकते हैं, निर्धनता , भुखमरी , अभाव व अन्याय से कराहते भारत में इसका पुनर्जीवित होना अतिआवश्यक है ।
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बुद्ध की शिक्षा दुख विनास की है,
भोग-विपन्नता दुख को जन्म देती है,
उपासक/उपासिका के लिए यह भोग-विपुलता प्राप्त करना आवश्यक है, बुद्ध आदेश है ।
निर्धनता पापों की जननी है ।
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अध्यात्मिक विपस्सना के विकास के साथ भोग-विपुलता को छोडना सही प्रतीत नहीं हो रहा है ।
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निर्धनों की निर्धनता दूर करने के उपाय भी समाज में लेजानें चाहिए, तभी.....
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उपासक/उपासिका हेतु विचारणीय सुत्त : -
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"महामंगल-सुत्त", (बहुजन-हिताय
बहुजन-सुखाय अनुकरणीय कम्म)
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"सिगालोवाद सुत्त" , (उपासक/उपासिका)
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"व्यग्घपज्ज सुत्त" , (उपासक/उपासिका)
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"महानाम सुत्त" , (भोग-संपन्न-अधिकारी)
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"हत्थक सुत्त" , (बड़े-व्यापारी)
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"थपति सुत्त" ; (काश्तकार)
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"माघ सुत्त" , (किसको-दान)
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"दान सुत्त" ,
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"अस्सलायन सुत्त", (वर्ण-प्रथा का उद्गम)
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"वासेठ सुत्त" , (वर्ण-व्यवस्था पर प्रहार)
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"पराभव सुत्त" , (भोग-विनाश)
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"अग्गञ्ञ सुत्त" , (सृष्टि व विनास)
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"चक्क-वत्ति-सीहनाद सुत्त" , (राज-धर्म)
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"महासुदस्सन-जातक" , (राज-धर्म)
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"कुटदन्त सुत्त", (16-परिष्कार-यज्ञ)
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"महाविजित जातक" , (16-परिष्कार-यज्ञ)
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"सेख-सुत्त" , (विज्ञ-उपासक को
क्या सीखना है)
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"परित्त पोथा" (तिपिटकिय सुत्त संकलन)
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आदि-आदि सुत्त जो -
उपासकों/उपासिकाओं को कहें गये अन्य सुत्त हैं।

-भिक्खु नन्द रत्न जी से साभार

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