बात 1640 की है, तब शाहजहाँ का शासन था....
रैदास और कबीर के ज्ञान की तब बड़ी शोहरत थी.....
ज्ञान पिपासु दारा शिकोह रैदास और कबीर के ज्ञान से प्रभावित थे.....
तब शाहजहाँ के समय में फकीर उल्ला बड़े चित्रकार थे....
दारा शिकोह ने फकीर उल्ला से आग्रह किया कि आप रैदास और कबीर की संयुक्त पेंटिंग बनाइए....
आखिरकार फकीर उल्ला ने 1640 में रैदास और कबीर की यह संयुक्त पेंटिंग बनाई है....
वर्तमान में यह पेंटिंग नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली में मौजूद है....
पेंटिंग का खूबसूरत किनारा है, धूसर रंग का सर्वाधिक प्रयोग है.....
पेंटिंग में कबीर की झोंपड़ी के बाहर रैदास पधारे हैं, दोनों के सिर पर पगड़ी है....
कबीर बुनाई का कार्य कर रहे हैं और रैदास चटाई पर बैठे हैं, बौद्धिक विमर्श जारी है....
कहने का मतलब यह है कि रैदास और कबीर की सत्रहवीं सदी में भी बड़ी शोहरत थी....
कबीर का परिवार तो मुस्लिम हो चुका था, लेकिन रैदास बगैर मुस्लिम हुए मुसलमानों के दिल में छा गए थे...
दारा शिकोह ने फकीर उल्ला से रैदास और कबीर की जो संयुक्त पेंटिंग बनवाई है, वह मुगल कालीन चित्रकला का मास्टरपीस है.....
पूरी चित्रकारी में शांति का अखंड साम्राज्य है, सर्वत्र शांति मानो बुद्ध फिर से धरती पर उतर आए हों....
~डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह
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