आजादी का अमृत महोत्सव नहीं आजादी का मृत महोत्सव चल रहा है। "हिंदू एकता", "हिंदू बचाओ", "हिंदुओं एक हो जाओ", जैसे फर्जी नारे देने वाले हिंदुओं ने आज एक हिंदू की ही हत्या कर दी क्योंकि वह दलित था, जाटव-मेघवाल था, मनुवादी व्यवस्था के अनुसार अछूत था। उसकी गलती यह थी कि उसने स्कूल के सार्वजनिक घड़े से पानी पी लिया था और मास्टर भड़क गया, मास्टर ने उसे पीट पीट कर मार डाला।
प्रतिदिन घटने वाली इस तरह की घटनाएं साबित करती है कि विश्व हिंदू परिषद, हिंदू सेना, हिंदू युवा वाहिनी, बजरंग दल आदि हिंदुओं के नहीं बल्कि केवल सवर्ण जातियों के संगठन हैं क्योंकि यह संगठन दलित और अति पिछड़ों की स्वघोषित उच्च वर्ग अर्थात कट्टरवादी-उग्रवादी-सवर्णों एवं दबंग जमींदार जातियों के उग्रवादियों के द्वारा की जाने वाली जातीय हत्याओं पर बोलते ही नहीं हैं।
इन संगठनों के नाम सवर्ण हिंदू परिषद, सवर्ण सेना, सवर्ण युवा वाहिनी, सवर्ण बजरंग दल होना चाहिए।
मेरी मांग है कि इस घटना की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए और केस को फास्ट ट्रैक कोर्ट में लाकर 3 महीने के अंदर दोषी को फांसी लगनी चाहिए। पीड़ित परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देना चाहिए और 5 करोड़ रुपए का मुआवजा देना चाहिए।
हर कमजोर दलित परिवार को एक सरकारी नौकरी पक्की करना चाहिए जिससे कि वह मजबूत हो सके। भूमिहीन दलितों को जमीन देना चाहिए।
आजादी के 75 साल बाद भी हम उतनी ही खतरनाक घटनाएं देख रहे हैं जैसी पहले देखते थे इसको लेकर सरकार को एक कमेटी गठित करनी चाहिए जो जांच करें कि जाति भेदभाव क्यों बढ़ रहा है और खामियों के बारे में बताएं सिफारिशें करें। जांच के बाद कमेटी की सिफारिशें लागू करनी चाहिए।
जहां-जहां भी सरकारी जमीने खाली हैं वे जमीने भूमिहीन दलितों को देना चाहिए जिससे कि इन की निर्भरता तथाकथित उच्च वर्ग की जातियों और मजबूत किसान-जमींदार जातियों पर कम हो।
सभी स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने चाहिए और उनकी निरंतर निगरानी होनी चाहिए।
सभी ग्राम पंचायतों में भी सीसीटीवी कैमरे लगने चाहिए और उनकी निरंतर निगरानी होनी चाहिए।
~संतोष शाक्य, उप संपादक, जन प्रख्यात, राष्ट्रीय मासिक समाचार पत्रिका

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